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स्वतंत्रता और गुलामी

 स्वतंत्रता और गुलामी स्वतंत्रता की शुभकामना- देते सभी एक दूसरे को, मैं भी कहता शुभ मंगल हो, आज़ादी की वेला ये | आज स्वतंत्रता की भावना में- बहते सभी नागरिक है, कल से क्या होगा फिर से- वही गुलामी तन मन की? देश आज़ाद हुआ लेकिन- सोच वही गुलामों की, कोई रोटी दे युहीं- न काम की कोई बात करे, सोच रहे राजा बन जाये- और घर बैठे आराम करे | हो सकता हो बंद हो मदिरा - पर नेताओं की हर रात सजे- आज़ाद देश तो कहते है, पर गुलाम नशे से करते हैं| हर कदम पर खुले मदिरालय हैं- पर जल सेवा का नाम नहीं | आज़ादी तो तब मानूं- जब जनता स्वतः काम करे, देश की सेवा भाव लिए- विश्व में देश का नाम करे | आलस्य, अकर्मण्य, द्वेष न हो- न किसी पर अत्याचार रहे, हृदय में देश की सांसे हों - तन देश की खातिर तैयार रहे | हृदय से शुभ मंगल है, जन-जन ऐसे ही आज़ाद रहे| स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामना 

दर्द

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इतनी आसानी से  इतनी आसानी से साथ छोड़ दिया तुमने - जैसे कभी कोई रिश्ता न था, मेरे आंसू, मेरी चाहत, मेरा दिल - कुछ कीमत समझता था इनकी, तुमने तोड़ा जो दिल वो सस्ता न था।  अब समझने लगा हूं दुनिया को - सब दिल की हसरत मिटाते हैं, कोई राधा न रही, कोई सीता न रही जो प्यार के इंतजार में खुद को जलाते हैं।   ~ अम्बरीष चन्द्र 'भारत'

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